ईरान पर खेला गया चीन का सबसे बड़ा दांव कैसे हुआ फुस्स? डूब सकता है 400 अरब डॉलर का निवेश, मास्टरप्लान फेल!

Updated on 07-03-2026 12:26 PM
बीजिंग/तेहरान: ईरान में पिछले एक दशक से चीन चुपचाप निवेश करता आ रहा था। लेकिन इजरायल और अमेरिका के युद्ध शुरू करने के बाद ऐसा लग रहा है कि चीन का मास्टरप्लान फेल हो गया है। पिछले कुछ सालों में चीन ने अमेरिका के दुश्मनों के साथ गहरी दोस्ती की है जिनमें रूस, ईरान, उत्तर कोरिया, क्यूबा, वेनेजुएला जैसे देश शामिल हैं। चीन ने इन देशों में भारी भरकम निवेश भी किए हैं। लेकिन चीन के लिए चीजें तेजी से बदलती जा रही हैं।

यूक्रेन जंग रूस पिछले पांच सालों से लड़ रहा है और ईरान युद्ध शुरू होने के बाद डोनाल्ड ट्रंप का ध्यान भी यूक्रेन से हट चुका है। वेनेजुएला के चीन समर्थक राष्ट्रपति निकोलस मादुरो अब अमेरिकी जेल में बंद हैं और ईरान में पिछले एक हफ्ते में जितने टन बम गिराए गये हैं उसका मलबा हटाने में ही अब कई साल लग जाएंगे। इसीलिए अचानक चीन का पूरा गेम प्लान खराब होता दिख रहा है। ईरान इन देशों में बहुत महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि ये चीन का पड़ोसी है।

चीन के रणनीतिक केन्द्र में कैसे शामिल था ईरान?

तेहरान सिर्फ बीजिंग के लिए एक आम सहयोगी नहीं था बल्कि बल्कि यह चीन की बड़ी रणनीति के केन्द्र में भी था। ईरान में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने भारी भरकम निवेश किया है।
  • मार्च 2021 में चीन और ईरान ने एक बहुत बड़ी रणनीतिक पार्टनरशिप पर साइन किए
  • इसमें चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत लंबे समय के इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी इन्वेस्टमेंट में 400 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया।
  • 2023 में ईरान को शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (SCO) शामिल किया गया जिससे चीन के साथ उसकी रणनीतिक भागीदारी और मजबूत हो गई।
  • चीन ईरानी तेल का मुख्य खरीदार बन गया है और ईरान के तेल एक्सपोर्ट का लगभग 90 प्रतिशत खरीदता है। ये ईरान की इकोनॉमी के लिए लाइफलाइन है।
चीन और ईरान के संबंध में भौगोलिक स्थिति भी काफी महत्वपूर्ण है। फारस की खाड़ी के किनारे और सेंट्रल एशिया को मिडिल ईस्ट से जोड़ते हुए, ईरान ने जमीन पर बने “बेल्ट” को समुद्री “रोड” से जोड़ा। वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक रणनीतिक नजरिए से इसने चीन को एक एनर्जी कॉरिडोर दिया जो अमेरिका के दबदबे वाले समुद्री चोक पॉइंट्स को बायपास कर सकता था। वहीं राजनीतिक नजरिए से इसने एक ऐसे इलाके के अंदर एक फॉरवर्ड बेस दिया जिसे ऐतिहासिक रूप से अमेरिकी ताकत ने बनाया था।इसके अलावा ईरान ने चीन का एक और मकसद भी पूरा किया है। मिलिटेंट प्रॉक्सी को सपोर्ट करके और इलाके में अस्थिरता का मौहाल बनाकर ईरान ने मध्य पूर्व को लगातार अशांत रखा है। ईरान एक तरफ से चीन के नेटवर्क को बढ़ा रहा था जैसे सऊदी और ईरान के बीच संबंध चीन ने ही सामान्य करवाए। ये चीन के ग्रेट गेम का हिस्सा है।

ईरान पर हमले से कैसे टूट गया चीन का मास्टरप्लान?

इजरायल और अमेरिका के हमले ने ईरान के इन्फ्रास्ट्रक्चर को तबाह कर दिया है। इस हमले में ना सिर्फ ईरान के न्यूक्लियर इन्फ्रास्ट्रक्चर तबाह हुए हैं बल्कि उसकी मिसाइल बनाने की क्षमता बुरी तरह से टूट गई है। ईरान की ड्रोन बनाने की क्षमता भी तहस-नहस हो गई है। इस हमले ने रातों रात रणनीतिक समीकरणों को बदल दिया है। लगातार होने वाले हमलों ने ईरान की मिलिट्री-इंडस्ट्रियल रीढ़ और हथियारों के भंडार की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी है। यानि ईरान का एक परमाणु देश बनने का सपना कम से कम अगले एक दशक के लिए टूट गया है।

इसके अलावा चीन का अमेरिका के विरोधी देशों के लिए बनाया गया गुट, जिसे CRINK एक्सिस कहा जाता है वो भी टूट सकता है। चीन ने ईरान को पूरी तरह से अकेला छोड़ दिया है। दो-चार बयानों के अलावा चीन ने कोई मदद नहीं दी है। इससे उसके सहयोगियों में गलत संदेश गया है और रणनीतिक पार्टनरशिप बेमतलब हो गया है।
ईरान को चीन ने पूरी तरह से छोड़ दिया अकेला
चीन के लिए आगे जाकर इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं। ईरान अब टूट चुका है और एक कमजोर देश शायद अगले कई सालों तक अमेरिका के लिए कोई खतरा पैदा नहीं कर पाएगा। चीन की तरफ से इलाके को अस्थिर करने की उसकी क्षमता कम कर दी गई है। ईरानी पोर्ट, रेल कॉरिडोर और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट अब खतरे में पड़ गये हैं। अमेरिकी नौसेना की ताकत से अलग एक सुरक्षित जमीनी एनर्जी कॉरिडोर का सपना अब अनिश्चितता में बदल गया है।

सिर्फ ईरान ही क्यों चीन ने वर्षों से खाड़ी देशों के बीच जो पांव पसारने की कोशिश की है उसे भी झटका लगा है। एक कमजोर ईरान अब खाड़ी देशों के लिए खतरा नहीं होगा। वहीं खाड़ी देश देख रहे हैं कि चीन का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पार्टनर बुरी तरह से पिट रहा है। चीन के लिए अब बैलेंसिग एक्ट को बनाए रखना मुश्किल है। जिसे कभी बीजिंग का मास्टरस्ट्रोक माना जाता था वह अब एक गलत कैलकुलेशन जैसा लगता है। ईरान का कमजोर होना इस इलाके पर बहुत लंबे समय तक असर डालेगा। चीन के लिए ये बहुत बड़ा रणनीतिक नुकसान है।

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